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दिल्ली:पहली महिला आदिवासी राष्ट्रपति– अनोखी शुभकामना

दिल्ली: नई राष्ट्रपति, प्रथम “आदिवासी” महिला राष्ट्रपति को हार्दिक शुभकामनाएं। शायद इस प्रकार लिखने में कुछ लोगों को यह लगे कि कितने प्रकार के विशेषण लगाकर कितना सम्मानजनक तरीके से शुभकामनाएं दी जा रही हैं। सही भी है। क्योंकि आज हिंदुस्तान का यह चलन है। राष्ट्रपति की निजी तौर पर जो खूबियां, कमियां, देश के लिए योगदान, कृतित्व, व्यक्तित्व को बताने समझाने के बजाय यह बताना जरूरी हो गया है कि वह किस जाति और किस वर्ग से आती है; वह अमीर घर की हैं या दरिद्र घराने से हैं; वह बेचारी कितनी तकलीफ में थी और कितनी कमजोर महिला रही हैं। फिर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने देखो देश की प्रथम महिला आदिवासी नागरिक होने का गर्व उन्हें प्रदान करवा ही दिया। यह हमारी नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जी का आज का विशेषण हो गया है। लेकिन समझदार लोग समझ गए होंगे की शुभकामनाएं तो दी गईं लेकिन जिस अंदाज में दी गईं हैं वह अंदाज आज की उस घटियातम राजनीति को दर्शाता है जो सबको दिखाई दे रही है पर समझ आने के बावजूद कोई इस पर कुछ नहीं कह रहा है कि कहीं हिंदुत्व की ठेकेदार बनी किसी पार्टी या हिंदुत्व के ठेकेदार बन चुके किसी नेता का अपमान हो जाए। कहीं ऐसा न हो जाए कि कोई मुझे विरोध करने के कारण कांग्रेसी कहकर अपमानित करने लगे या कोई काम्यूनिष्ट ही कह दे।
मित्रों,
सवर्ण , मुस्लिम , सिख , महिला और दलित राष्ट्रपति के बाद अब द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति की नई पहचान देने की कोशिश की जा रही है । द्रौपदी मुर्मू सामाजिक ताने – बाने से समाज के चाहे जिस तबके का भी प्रतिनिधित्व क्यों न करती हों लेकिन आज वो इस देश की संवैधानिक मुखिया हैं । राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री का पद एक संवैधानिक पद ही होता है। इसे दलित , महिला , आदिवासी , सिख , हिन्दू , मुस्लिम या ऐसे ही किसी दूसरे तरह के प्रतिमानों से देखने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। बल्कि ऐसे प्रयासों को केवल इसी प्रकार से समझना चाहिए कि जो राक्षस से लड़ रहे थे वह आज महा राक्षस हो गए हैं। क्या देश के राष्ट्रपति के प्रति, जो कि 135 करोड़ से ज्यादा लोगों का प्रमुख है, जिसे प्रथम नागरिक का दर्जा प्राप्त है; उसके प्रति स्वाभाविक श्रद्धा स्नेह और विश्वास नहीं होना चाहिए? क्या.. वह दलित है, आदिवासी है, महिला है बिचारी, कितनी गरीब थी, ऐसा कह कह कर के उसके प्रति श्रद्धा पैदा की जाएगी? यह तो दया का भाव पैदा करता है। जो श्रद्धा डॉ राजेंद्र प्रसाद के प्रति थी या डॉक्टर अब्दुल कलाम को हिंदुस्तान के लोगों का जो स्नेह सम्मान और प्यार नसीब हुआ वैसा और कितने को मिला होगा? और नहीं मिला तो क्यों नहीं मिला? आखिर जातिवाद के खिलाफ लड़ना है तो क्या हम नए जातिवादी राक्षस नहीं बन गए? भारत के जितने भी राष्ट्रपति बने हैं उसमें से अब तक केवल 4 को ही भारत रत्न की उपाधि मिली। अभी हाल ही में जो राष्ट्रपति रिटायर हुए, पिछले 5 वर्षों में उनका राष्ट्रीय परिपेक्ष में कोई योगदान ?? ऐसा नहीं कि यह पहली बार हो रहा है। कभी ज्ञानी जैल सिंह ने कहा था कि मैं अपनी खाल से इंदिरा गांधी के लिए जूते बनवा सकता हूं। वो राष्ट्रपति बने। मतलब राष्ट्रपति रबर स्टैंप तो होता ही है सिद्ध किया गया लेकिन ऐसा रबर स्टैंप? डॉ राजेंद्र प्रसाद नामी वकील थे वह चाहते तो खूब माल कमा सकते थे। लेकिन उन्होंने सब छोड़कर देश की आजादी के आंदोलन में भाग लिया इसलिए उनको प्रतिष्ठा मिली। इसलिए नहीं प्रतिष्ठा मिली कि हाय कितने गरीब थे कितने घरों का बर्तन मांज दिया या मौका मिलने पर भी नहीं कमा सके, फलां जाति के थे। डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन राष्ट्रपति बने उनका भारतीय जीवन दर्शन सारी दुनिया के लिए आदर्श है। किसी ने नहीं कहा कि वह फला फला परिवार से आए और हमने उनको बनवा दिया… स्थिति देखिए कि 15 राष्ट्रपति में से कुल 4 को भारत रत्न मिला और शेष को किसी भी प्रकार के भारत के अन्य किसी सम्मान के योग्य भी नहीं समझा गया। तो चाहे राष्ट्रपति मुर्मू हो चाहे और कोई भी हो। वो तो जिस प्रकार बनी वह उस संक्रमण काल के नेतृत्वकर्ता माने जाएंगे जो वर्तमान में चल रहा है। ऐसे ही लोग जो दलों और नेताओं के प्रचंड दबाव में होते हैं उनके राष्ट्रपति बनने के बाद क्या स्थिति होती है, इसे एक उदाहरण से समझना चाहिए कि इंदिरा गांधी ने जब आपातकाल लगाया तब राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली को रात गहरी नींद में सोते से उठा लिया और बिना संसद या कैबिनेट की अनुमति प्राप्त किए ही रातों-रात आपातकाल लगाने के आदेश जारी करवाए। क्या इस प्रकार के काम को देश ने कभी स्वीकार किया? चूंकि इंदिरा गांधी ने ऐसा करवाया था इसलिए वर्तमान सत्ता उसके भी आगे बढ़ कर करने का इरादा रखती है। अब सबसे बड़ी मजे की बात यह है कि वर्तमान सत्ताधारी पार्टी को ब्राह्मणवादी विचार की पार्टी का तमगा लगा है। वह जो केवल वोट की राजनीति को साधने के लिए आदिवासी दलित यादव बनिया कुर्मी तेली कर रहे हैं, उनको ब्राह्मणवादी होने का तमगा लगा है। अगर इसी का नाम ब्राह्मणवाद है, तो ऐसे ब्राह्मणवाद का ऐसी बुरी तरह विनाश होना चाहिए कि दोबारा सर ना उठा सके। क्योंकि ब्राह्मणवाद या ब्राह्मणत्व किसी पार्टी के लिए वोट जुटाने का नाम तो नहीं हो सकता। इसलिए यह कहना उचित होगा कि आज की राजनीति में पक्ष और विपक्ष सिर्फ अपने स्वार्थ साधने के लिए अपनी वोट की राजनीति को चमकाने के लिए और खुद को जबरन सर्वश्रेष्ठ दिखाने के लिए सारे कुकर्म कर रहे हैं। हम नहीं भूल सकते कि जब राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल बनी और रिटायर हुई तब वो स्वयं को मिले सारे उपहार अपना निजी मानकर अपने घर उठा ले गई। जबकि राष्ट्रपति को मिले उपहार राष्ट्रीय अमानत याने देश की अमानत होते हैं।और दलित के नाम पर चुने गए अभी-अभी सेवानिवृत्त हुए राष्ट्रपति का नाम तो न जाने कितने एक्टिव पॉलीटिशियन के मुंह में चढ़ा ही नहीं होगा। इसी प्रकार वर्तमान राष्ट्रपति का जिस प्रकार से महिमामंडन किया जा रहा है और यह बताया जा रहा है कि उनकी कोई व्यक्तिगत हैसियत नहीं थी उन्हें तो भाजपा ने बनवा दिया… इसका मतलब उनकी व्यक्तिगत हैसियत राजनीतिक महकमे में क्या और कितनी होगी ? आगे यह समझाने की जरूरत नहीं है। 5 साल का समय देख लीजिएगा। यह भी आई हैं, चली जाएंगी। क्योंकि अब कृतित्व और व्यक्तित्व नहीं सिर्फ और सिर्फ वोट और सत्ता सर्वोपरि है। राष्ट्रपति का पद अगर भारत की गरिमा को परिलक्षित नहीं करता। तो यह भारत का दुर्भाग्य ही है। फिर भी हमें मान कर चलना चाहिए कि शायद सब अच्छा ही होगा क्योंकि ऐसा सभी सोचने को कहते हैं।

लेखक-सतीश त्रिपाठी छत्तीसगढ़

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