महर्षि दयानंद ने सांस्कृतिक पुनरुत्थान के द्वारा राष्ट्रभक्ति का अलख जगाया: आचार्य डॉ. अजय आर्य
दीपक कुमार। विशेष संवाददाता

भिलाई। आर्य समाज वैदिक सत्संग समिति, पतंजलि योग समिति एवं भारत स्वाभिमान परिवार के संयुक्त तत्वावधान में आर्य समाज के संस्थापक, महान समाज सुधारक और वेदों के पुनर्जागरणकर्ता महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती का बलिदान दिवस श्रद्धा, संकल्प और वैदिक परंपरा के साथ मनाया गया।
कार्तिक अमावस्या 1883 ईस्वी के दिन महर्षि दयानंद ने अपनी इहलीला समाप्त की थी। कार्यक्रम का शुभारंभ वैदिक मंत्रोच्चारण और अग्निहोत्र यज्ञ के साथ हुआ। श्रद्धालुओं ने आहुतियां अर्पित कीं और पूरा वातावरण वेदध्वनि से गूंज उठा। ऐसा प्रतीत हुआ मानो “ज्योति से ज्योति जलाने” की परंपरा आज भी जीवंत है।मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित गुरुकुल प्रभात आश्रम, मेरठ के आचार्य डॉ. अजय आर्य ने कहा कि महर्षि दयानंद के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके समय में थे। उन्होंने कहा—“लोग वेदों को मानते तो हैं, पर जानते नहीं हैं। स्वामी दयानंद का ‘वेदों की ओर लौटो’ का संदेश मानवता को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का दीप है। डॉ. आर्य ने कहा कि ऋषि दयानंद के जीवन में ‘दया’ और ‘आनंद’ के दो भाव प्रमुख थे। यदि मनुष्य इन दोनों को अपने भीतर जगा ले, तो यह जगत स्वयं आलोकित हो जाएगा। उन्होंने कहा कि यज्ञ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि वैज्ञानिक प्रक्रिया है—जो शुद्ध वायु, शुद्ध विचार और शुद्ध समाज की आधारशिला रखती है। उन्होंने कहा कि जीवन को बदलने के लिए केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि ध्यान और आत्मचिंतन भी उतना ही आवश्यक है। संस्कृत ग्रंथ कादंबरी का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा—“यौवन, धन, अधिकार और विवेक—इन चारों में से कोई एक भी यदि नियंत्रण से बाहर हो जाए, तो मनुष्य विनाश की ओर बढ़ता है।” स्वामी दयानंद ने इसी विवेक की ज्योति जगाई थी।कार्यक्रम का संचालन राकेश दुबे ने किया। उन्होंने दीपावली के संदर्भ में कहा—“हर कोई बाहर रोशनी करता है, पर भीतर के अंधेरे को जलाना भूल जाता है। स्वामी दयानंद ने सिखाया कि असली दीपक वह है जो अपने भीतर से प्रकाश फैलाए।”पतंजलि योग समिति के नवीन यदु और रवि ने कहा कि जीवन में जो भी सकारात्मक परिवर्तन आया है, वह ऋषि दयानंद की प्रेरणा का परिणाम है।चतुर्भुज अग्रवाल ने समाज में वैदिक चेतना के प्रसार हेतु प्रति माह एकादश कुंडी महायज्ञ आयोजित करने की घोषणा की।धन्यवाद ज्ञापन राजेंद्र अग्निहोत्री ने किया। उन्होंने कहा कि आचार्य डॉ. अजय आर्य के विचार केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि जीवन में उतारने के लिए हैं।कार्यक्रम का समापन शांति पाठ और प्रसाद वितरण के साथ हुआ। अंत में एक ही संदेश सबके मन में गूंजता रहा—दीप केवल जलाने की वस्तु नहीं, बल्कि जीने की दिशा है।”कार्यक्रम में नगर के अनेक गणमान्य नागरिक एवं समाजसेवी उपस्थित रहे, जिनमें पं. राकेश दुबे, चतुर्भुज अग्रवाल, राजेंद्र अग्रवाल, मुकेश जैन, लोकेश्वर साहू, श्रीमती किरण साहू, देवेश साहू, संजय अग्रवाल, शिवन गुप्ता, संजय शुक्ला, सीमा श्रीवास्तव, रौनक श्रीवास्तव और शीतल पटेल प्रमुख रूप से शामिल थे।
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