मासिक मोरल टॉक में विद्यार्थियों ने पूछे जीवन से जुड़े सवाल, आचार्य डॉ. अजय आर्य ने दिए सरल और प्रेरक समाधान
अच्छा करो, समय की कीमत पहचानो और दूसरों की चिंता कम करो : आचार्य डॉ. अजय आर्य

अनिता मिश्रा/दीपक कुमार। दुर्ग। विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों, सकारात्मक सोच, आत्मविश्वास, अनुशासन, समय प्रबंधन और जीवन के प्रति स्वस्थ दृष्टिकोण विकसित करने के उद्देश्य से आयोजित मासिक मोरल टॉक में आचार्य डॉ. अजय आर्य ने विद्यार्थियों से संवाद किया। कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने पढ़ाई, आत्मविश्वास, मंच पर बोलने, मित्रों की सोच, समय के सदुपयोग और व्यक्तित्व निर्माण से जुड़े सवाल पूछे, जिनका उन्होंने सरल एवं प्रेरक अंदाज में समाधान दिया।आचार्य डॉ. अजय आर्य ने विद्यार्थियों को जीवन बेहतर बनाने के तीन सूत्र बताते हुए कहा कि “अच्छा करो, चिंता कम करो और चिंतन ज्यादा करो तथा दूसरों की चिंता भी कम करो।” उन्होंने कहा कि आज की बड़ी समस्या “लोग क्या कहेंगे” की चिंता है। व्यक्ति को दूसरों के विचारों और आलोचनाओं की चिंता करने के बजाय स्वयं को बेहतर बनाने पर ध्यान देना चाहिए।उन्होंने समय को जीवन की सबसे मूल्यवान संपत्ति बताते हुए कहा कि धन और वस्तुएं दोबारा प्राप्त की जा सकती हैं, लेकिन बीता हुआ समय कभी वापस नहीं आता। विद्यार्थियों को मोबाइल, मनोरंजन और अनावश्यक चिंताओं में समय गंवाने के बजाय अध्ययन, व्यायाम, रचनात्मक कार्य और आत्मविकास में समय लगाने की सलाह दी। सवाल पूछना कमजोरी नहीं, सीखने की शुरुआत विद्यार्थी जेम्स स्मिथ ने कक्षा में सवाल पूछने में होने वाले डर को लेकर प्रश्न किया। आचार्य ने कहा कि दूसरे आपके बारे में क्या सोचते हैं, यह आपके नियंत्रण में नहीं है, लेकिन आप क्या सीखना चाहते हैं, यह आपके हाथ में है। उन्होंने विद्यार्थियों को मंत्र दिया—“सोचो, पूछो, सीखो और आगे बढ़ो।” वहीं संस्कृति सिंह ने लोगों के सामने बोलने के डर को लेकर सवाल किया। इस पर उन्होंने कहा कि आत्मविश्वास जन्म से नहीं आता, बल्कि निरंतर अभ्यास से विकसित होता है। आईने के सामने बोलने से शुरुआत कर धीरे-धीरे छोटे समूह और फिर बड़े मंच पर बोलने का अभ्यास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि “मंच का डर मंच से भागने से नहीं, बल्कि मंच पर बार-बार जाने से समाप्त होता है।” शिकायत नहीं, सुधार के प्रयास से बदलता है जीवन आचार्य डॉ. अजय आर्य ने बोधकथा के माध्यम से विद्यार्थियों को समझाया कि जीवन की समस्याओं के लिए हमेशा दूसरों को दोष देने के बजाय स्वयं में सुधार की शुरुआत करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि दूसरों की एक कमी खोजने के बजाय प्रतिदिन अपने भीतर एक अच्छाई जोड़ने का प्रयास करें। उन्होंने विद्यार्थियों को प्रतिदिन तीन सवाल स्वयं से पूछने की प्रेरणा दी—आज मैंने क्या अच्छा किया? आज मैंने क्या नया सीखा? और कल मैं आज से बेहतर क्या कर सकता हूं? कार्यक्रम में बाबा भारती की प्रेरक कथा का उल्लेख करते हुए उन्होंने विश्वास, मानवता और सकारात्मक सोच बनाए रखने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि दुनिया की नकारात्मकताओं के बीच भी हमें अपने व्यवहार से विश्वास और सहयोग का वातावरण बनाना चाहिए। डायरेक्टर अवधेश प्रसाद मौर्य ने आचार्य डॉ. अजय आर्य का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे संवादात्मक कार्यक्रम विद्यार्थियों के बौद्धिक विकास के साथ उनके नैतिक एवं भावनात्मक व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कार्यक्रम में प्राचार्य सुष्मिता दास सहित रश्मि सिंह, दामिनी राहड़े, आकांक्षा बेल चंदन, शिवानी गोखले, आकांक्षा तिवारी, अनामिका सिन्हा, पलक लिवानी, निशु कुमारी, संगीता गोस्वामी, नम्रता सिंह यादव, सोहन लाल, विशाल कुमार नाग, सरिता मोहंती, अनुभा अग्रवाल, सुमन यादव एवं शारदा शुक्ला सहित शिक्षकगण उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संदेश: दूसरों को बदलने की चिंता कम करें, खुद को बेहतर बनाने की शुरुआत करें। शिकायत कम करें, प्रयास अधिक करें। समय का सम्मान करें और सवाल पूछने से कभी न डरें।
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